भावाअशिप - लकड़ी विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान, बेंगलुरु https://iwst.icfre.gov.in
परिचय:
भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के अंतर्गत स्थापित संस्थानों में से एक, काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (Institute of Wood Science & Technology – IWST), बेंगलुरु की स्थापना वर्ष 1988 में की गई। इससे पूर्व, तत्कालीन मैसूर सरकार द्वारा वर्ष 1938 में बेंगलुरु में वन अनुसंधान प्रयोगशाला (Forest Research Laboratory – FRL) की स्थापना की गई थी। प्रारंभिक वर्षों में विभिन्न काष्ठ प्रजातियों के गुण एवं उपयोग, आवश्यक तेल, अन्य गैर-काष्ठ वन उत्पादों तथा लकड़ी एवं वृक्षों को कीट एवं रोगों से संरक्षण से संबंधित कार्य किए गए। वर्ष 1956 में इस प्रयोगशाला को देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान एवं महाविद्यालयों के एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में संगठित किया गया। वर्ष 1977 में चंदन की आनुवंशिकी, वानिकी (सिल्वीकल्चर) एवं प्रबंधन के विविध पहलुओं पर अनुसंधान करने हेतु चंदन अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई।
दायित्व (Mandate):
1. वन संसाधनों के वैज्ञानिक एवं सतत प्रबंधन की दिशा में वानिकी अनुसंधान, शिक्षा एवं विस्तार गतिविधियों को करना एवं प्रोत्साहित करना।
2. राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय महत्व के विषयों तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से संबंधित मामलों में सूचित निर्णय लेने हेतु केंद्रीय एवं राज्य सरकारों को वैज्ञानिक परामर्श प्रदान करना तथा वानिकी अनुसंधान आवश्यकताओं को संबोधित करना।
3. वानिकी, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन से संबंधित ज्ञान का भंडार (Repository) के रूप में कार्य करना, विशेष रूप से काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में।
4. वन संसाधनों के संरक्षण एवं सतत उपयोग हेतु राज्यों, वन-आश्रित समुदायों, वन आधारित उद्योगों, वृक्ष एवं गैर-काष्ठ वन उत्पाद (NTFP) उत्पादकों तथा अन्य हितधारकों को उनके वानिकी आधारित कार्यक्रमों में तकनीकी एवं भौतिक सहायता प्रदान करना।
5. काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सभी पहलुओं पर राष्ट्रीय उद्देश्य के अंतर्गत अनुसंधान करना, जैसे काष्ठ के भौतिक एवं यांत्रिक गुण, लकड़ी की पहचान, काष्ठ सुखाना एवं संरक्षण, काष्ठ सम्मिश्र (वुड कंपोज़िट), बाँस प्रसंस्करण एवं उपयोग।
6. प्राकृतिक एवं रोपित वनों में संरक्षण तथा उच्च उत्पादकता हेतु प्रजातियों के प्रबंधन एवं वानिकी (सिल्वीकल्चर) पर अनुसंधान करना।
7. लकड़ी एवं बाँस के उपयोग से संबंधित विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों के विकास हेतु वन संसाधनों के सतत उपयोग पर अनुसंधान करना।
8. वन पारिस्थितिकी तंत्र में कीट एवं रोग प्रबंधन पर अनुसंधान करना।
9. नवाचारी विस्तार रणनीतियों एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से उपयुक्त प्रौद्योगिकियों का विकास, विस्तार, प्रसार एवं अंतिम उपयोगकर्ताओं के साथ साझा करना।
10. उन्नत काष्ठ कार्य (Advanced Wood Working) में शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करना।
11. परिषद के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक, सहायक एवं अनुकूल सभी गतिविधियाँ करना।
मुख्य अनुसंधान क्षेत्र:
1- काष्ठ शरीर रचना एवं गुण
2- काष्ठ प्रसंस्करण एवं काष्ठ सम्मिश्र सामग्री हेतु प्रौद्योगिकियों का विकास
3- वृक्ष सुधार एवं प्रवर्धन – कृषि वानिकी एवं वानिकी (सिल्वीकल्चर)
4- वन एवं काष्ठ संरक्षण
5- काष्ठ रसायन एवं जैव-ऊर्जा
भौगोलिक अधिकार क्षेत्र:
कर्नाटक एवं गोवा
मुख्य सफलतायें: (विवरण देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें)
1: आजीविका सहायता और आर्थिक विकास के लिए वनों और वन उत्पादों का प्रबंधन:
दक्षिण भारत की कम ज्ञात एवं रोपण से उगाई गई लकड़ियों का उन्नत उपयोग
रोपण प्रजातियों के शारीरिक (एनाटॉमिकल), भौतिक एवं यांत्रिक गुणों की समझ विभिन्न अंतिम उपयोगों के लिए लकड़ी के वर्गीकरण एवं ग्रेडिंग में सहायक होती है। पारंपरिक लकड़ियों के विकल्प के रूप में इन प्रजातियों को बढ़ावा देने में वैज्ञानिक आँकड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी दिशा में IWST द्वारा इन लकड़ियों के गुणों के मूल्यांकन हेतु कार्य किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अनेक कम ज्ञात/रोपण प्रजातियों पर वैज्ञानिक आँकड़े विकसित किए गए। इन आँकड़ों के आधार पर उनकी भौतिक एवं यांत्रिक विशेषताओं के अनुसार विभिन्न अंतिम उपयोगों के लिए लकड़ी का वर्गीकरण संभव हुआ। प्राकृतिक वनों से प्राथमिक लकड़ियों पर दबाव कम करने के उद्देश्य से कई कम ज्ञात लकड़ियों एवं रोपण से प्राप्त लकड़ियों का विभिन्न भौतिक, यांत्रिक एवं शारीरिक गुणों के लिए अध्ययन किया गया, ताकि अलग-अलग अनुप्रयोगों में उनकी उपयुक्तता का निर्धारण किया जा सके। निर्माण, दरवाज़ा-खिड़की शटर, फर्नीचर, हस्तशिल्प, कृषि औज़ार, खेल सामग्री, औज़ारों के हैंडल आदि संभावित उपयोगों के लिए उपयुक्तता सूचकांक निर्धारित किए गए तथा विभिन्न अंतिम उपयोगों के लिए अनुशंसाएँ की गईं।
वुड-पॉलिमर कंपोज़िट
IWST ने वुड पॉलिमर कंपोज़िट (WPC) प्रौद्योगिकी के विकास पर व्यापक कार्य किया है, जिसमें पॉलीप्रोपाइलीन (PP), हाई डेंसिटी पॉलीएथिलीन (HDPE) आदि थर्मोप्लास्टिक्स को प्राकृतिक रेशों से सुदृढ़ किया जाता है। यह प्रौद्योगिकी प्लास्टिक उत्पादों को अधिक हरित एवं पर्यावरण-अनुकूल बनाने तथा लकड़ी अपशिष्ट, वन खरपतवार, कृषि अवशेष एवं अन्य प्राकृतिक लिग्नो-सेलुलोसिक रेशों में मूल्य संवर्धन का अनूठा अवसर प्रदान करती है।
प्राकृतिक रेशों और थर्मोप्लास्टिक्स के बीच असंगतता ऐसे कंपोज़िट पदार्थों के विकास में एक प्रमुख चुनौती है। IWST ने एक नवीन कपलिंग एजेंट का संश्लेषण किया है, जो प्लास्टिक और प्राकृतिक रेशों के बीच संगतता को बेहतर बनाता है। इस कपलिंग एजेंट से तैयार कंपोज़िट ने पारंपरिक कपलिंग एजेंट्स की तुलना में कहीं बेहतर यांत्रिक गुण प्रदर्शित किए। विकसित कंपोज़िट वर्जिन पॉलिमर या पारंपरिक अकार्बनिक फिलर आधारित थर्मोप्लास्टिक कंपोज़िट्स की तुलना में अधिक मज़बूत, कठोर, नमी-प्रतिरोधी एवं आयामी रूप से स्थिर हैं। इनका बड़े पैमाने पर प्रोफाइल एक्सट्रूडेड एवं इंजेक्शन मोल्डेड उपयोगी उत्पादों में अनुप्रयोग है। IWST में विकसित WPC ग्रैन्यूल्स से डेकिंग, लेखन पेन, हैंगर, गार्डन पॉट आदि उत्पादों का प्रदर्शन किया गया है। संस्थान ने इस प्रौद्योगिकी पर भारतीय पेटेंट हेतु आवेदन किया है तथा व्यावसायिक आधार पर तकनीक का हस्तांतरण भी किया है।
बाँस से नैनो-सेलुलोसिक व्हिस्कर
बाँस पल्प से नैनो-सेलुलोज़ व्हिस्कर के उत्पादन की एक विधि का मानकीकरण किया गया। नैनो व्हिस्कर को पृथक करने की तीन विधियाँ— (a) अम्लीय हाइड्रोलिसिस, (b) एंज़ाइमेटिक हाइड्रोलिसिस तथा (c) TEMPO-मध्यस्थ ऑक्सीकरण—का मूल्यांकन किया गया। मानकीकृत प्रक्रिया में ऊर्जा की आवश्यकता बहुत कम होती है तथा रेशों का ऊष्मीय अपघटन भी कम होता है। बाँस नैनो-रेशों का व्यास कुछ नैनोमीटर तथा लंबाई कुछ माइक्रोमीटर (चौड़ाई 5–15 nm) पाई गई। बाँस आधारित नैनो-रेशों से पारदर्शी एवं लचीली फिल्में तैयार की गईं, जिनमें अत्यधिक उच्च भंडारण मापांक (~100 GPa) पाया गया। विकसित नैनो-सेलुलोज़ का विशेष कंपोज़िट सामग्री, जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि आदि क्षेत्रों में व्यापक संभावित उपयोग है।
लकड़ी का तापीय संशोधन
तापीय संशोधन पारंपरिक रूप से कम गुणवत्ता वाली लकड़ियों के मूल्य संवर्धन हेतु कुछ वांछनीय गुणों को बढ़ाता है, जिससे वे उच्च मूल्य प्रजातियों के विकल्प के रूप में उपयोगी बनती हैं। निष्क्रिय वातावरण में उच्च तापमान (150–250°C) पर लकड़ी का ऊष्मा उपचार आयामी स्थिरता, रंग-रूप तथा जैव-अपघटन प्रतिरोध में सुधार की एक प्रभावी तकनीक है। प्रक्रिया मानकों में परिवर्तन कर गहरे भूरे रंग सहित विभिन्न गुणों को नियंत्रित किया जा सकता है। ऊष्मा-उपचारित लकड़ी को आयु बढ़ाने हेतु किसी अतिरिक्त संरक्षक रसायन की आवश्यकता नहीं होती। अच्छे मौसम-प्रतिरोध के कारण यह बाहरी उपयोग—बाहरी क्लैडिंग, खिड़की फ्रेम, गार्डन फर्नीचर आदि—के लिए भी उपयुक्त है। रबरवुड (Hevea brasiliensis), अकासिया (Acacia auriculiformis), यूकेलिप्टस (Eucalyptus tereticornis), Melia dubia, पॉपलर आदि स्थानीय रोपण लकड़ियों के मूल्य संवर्धन हेतु ऊष्मा उपचार प्रक्रिया विकसित की गई है। उन्नत गुण गैर-स्थायी रोपण लकड़ियों के उपयोग हेतु उद्योग को नए अवसर प्रदान करते हैं। प्रक्रिया-ज्ञान उद्योग को हस्तांतरण हेतु उपलब्ध है।
लकड़ी का अपक्षय एवं सतह संरक्षण
IWST ने लकड़ी को मौसमजन्य अपक्षय से बचाने हेतु रासायनिक संशोधन, ऊष्मा उपचार एवं सतह कोटिंग्स पर व्यापक अनुसंधान किया है। विभिन्न रसायनों (अम्ल एनहाइड्राइड, अम्ल क्लोराइड, ऐल्किलीन ऑक्साइड) से संशोधित लकड़ी के प्रदर्शन का अध्ययन आयामी स्थिरता, फोटो-स्थिरता एवं जैव-प्रतिरोध सुधार के उद्देश्य से किया गया, जिनमें कुछ प्रणालियाँ प्रभावी पाई गईं। कोटिंग से पूर्व लकड़ी के रासायनिक संशोधन से कोटिंग का प्रदर्शन उल्लेखनीय रूप से बेहतर होता है। NBS एवं आयोडीन उत्प्रेरक की उपस्थिति में एसीटिक एनहाइड्राइड द्वारा विलायक-मुक्त एसीटाइलेशन पारंपरिक तथा माइक्रोवेव ऊष्मन के अंतर्गत किया गया। माइक्रोवेव ऊष्मन में कुछ ही मिनटों में पर्याप्त एसीटाइलेशन प्राप्त हुआ। संशोधित लकड़ी में अच्छी जल-अपसारकता एवं आयामी स्थिरता देखी गई। आइसोप्रोपेनिल एसीटेट (IPA) से ठोस लकड़ी के एसीटाइलेशन की प्रक्रिया विकसित की गई, जिसमें अम्लीय उप-उत्पाद नहीं बनता तथा UV एवं फफूंद प्रतिरोध में सुधार पाया गया।
लकड़ी का माइक्रोवेव सुखाना
फाइबर संतृप्ति बिंदु से नीचे लकड़ी का सुखाना अत्यधिक ऊर्जा-साध्य एवं समय-साध्य होता है तथा अधिकांश क्षति इसी चरण में होती है। संस्थान ने माइक्रोवेव आधारित लकड़ी सुखाने की एक प्रोटोटाइप प्रणाली विकसित की है, जो इस क्षेत्र में प्रभावी है। यह प्रणाली सुखाने का समय दिनों से घटाकर घंटों में कर देती है तथा सुखाने की गुणवत्ता पारंपरिक भट्ठी-सुखाई लकड़ी से बेहतर होती है।
लकड़ी संरक्षण
जैव-अपघटनीय सामग्री होने के कारण लकड़ी की सेवा-आयु बढ़ाने हेतु संरक्षण आवश्यक है। वर्तमान में पौध-उत्कर्ष एवं बीज तेलों से तैयार पर्यावरण-अनुकूल संरक्षकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। Pongamia pinnata के बीजों का तेल (तांबे के साथ या बिना) एक आशाजनक संरक्षक पाया गया। कटाई स्थल पर हरे खंभों/बाँस के उपचार हेतु एक सरल सैप-डिस्प्लेसमेंट तकनीक का मानकीकरण किया गया। संस्थान द्वारा विकसित संशोधित बाउशेरी प्रक्रिया को व्यापक स्वीकृति मिली है और हरे खंभों/बाँस के त्वरित उपचार में इसका सामान्य उपयोग होता है।
नैनो-आधारित तांबा लकड़ी संरक्षक
नैनो-आधारित जल-आधारित माइक्रोनाइज़्ड तांबा फॉर्मुलेशन का उपयोग रबरवुड, Acacia auriculiformis एवं Melia dubia जैसी कम टिकाऊ लकड़ियों के उपचार हेतु पारंपरिक CCA संरक्षकों के विकल्प के रूप में किया गया। उपचारित लकड़ी में तांबे का लीचिंग कम पाया गया तथा यांत्रिक गुण प्रभावित नहीं हुए। क्षेत्रीय परिस्थितियों में दीमक-आक्रमण के विरुद्ध उत्कृष्ट टिकाऊपन देखा गया। यह अध्ययन माइक्रोनाइज़्ड तांबे को उन्नत, प्रभावी एवं किफायती विकल्प के रूप में स्थापित करता है।
नैनो-ऑब्जेक्ट युक्त लकड़ी कोटिंग्स
बाहरी परिस्थितियों में दीर्घकालिक प्रदर्शन हेतु कोटिंग सामग्री एवं लकड़ी को UV विकिरण से संरक्षण आवश्यक है। नैनो-धातु ऑक्साइड युक्त कोटिंग्स UV से सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं। सिलेन (3-glycidoxypropyltrimethoxy silane) द्वारा नैनोकणों के कार्यात्मककरण पर आधारित पॉलीयूरेथेन कोटिंग्स में नैनोकणों के समान वितरण की विधि विकसित की गई। जिंक ऑक्साइड, सेरियम ऑक्साइड एवं टाइटेनियम डाइऑक्साइड के साथ लेपित रबरवुड की UV प्रतिरोधिता का मूल्यांकन किया गया। नैनोकणों का समावेशन रंग परिवर्तन एवं फोटो-अपघटन को उल्लेखनीय रूप से सीमित करता है।
जैव-आधारित पॉलिमर इम्प्रेग्नेशन द्वारा उन्नत लकड़ी
लकड़ी संशोधन की व्यावहारिक विधियों में फरफ्यूरिलेशन प्रमुख है। फरफ्यूरिल अल्कोहल के इम्प्रेग्नेशन एवं ऊष्मा द्वारा क्योरिंग से भार-वृद्धि प्राप्त हुई, जो घोल की सान्द्रता पर निर्भर थी। द्वितीयक लकड़ियों में फरफ्यूरिल अल्कोहल से आयामी स्थिरता एवं सड़न-प्रतिरोध में सुधार हुआ।
लकड़ी का गैर-विनाशकारी परीक्षण
लॉग/बिलेट में छिपे दोष (मुख्यतः खोखलापन) पहचानने हेतु अल्ट्रासोनिक विधि का परीक्षण किया गया। पुराने दरवाज़े, खिड़कियाँ, फ्रेम एवं शटर का मूल्यांकन पारंपरिक तथा अल्ट्रासोनिक NDT से किया गया। दोनों विधियों में सामंजस्य पाया गया, जिससे संरचनाओं में प्रयुक्त लकड़ी की स्थिति जानने एवं पुन: उपयोग के लिए मार्गदर्शन मिलता है।
ASTM E1050-98 मानक के अनुसार इम्पीडेंस ट्यूब विधि से लकड़ी के ध्वनिक गुणों के निर्धारण हेतु कंप्यूटर-आधारित परीक्षण सेट-अप विकसित किया गया। इससे पैनलिंग हेतु ध्वनि-इन्सुलेशन सामग्री के रूप में रोपण लकड़ियों के ग्रेडिंग/चयन में सहायता मिली तथा संगीत वाद्ययंत्रों के लिए गैर-परंपरागत लकड़ी प्रजातियों के वैज्ञानिक चयन में उपयोग हुआ।
माइक्रोवेव सहायतित तेल निष्कर्षण एवं बायोडीज़ल उत्पादन
माइक्रोवेव विकिरण द्वारा बीज-पूर्व उपचार के बाद हेक्सेन विलायक से तेल निष्कर्षण कम समय में अधिक पुनर्प्राप्ति हेतु प्रभावी पाया गया। कोशिका झिल्ली के विघटन एवं स्थायी छिद्रों के निर्माण से द्रव्यमान स्थानांतरण बढ़ा और निष्कर्षण समय घटा, जबकि तेल के गुण अपरिवर्तित रहे। यह प्रक्रिया विभिन्न बीजों के तेल निष्कर्षण में उपयोगी हो सकती है।
Pongamia pinnata बीज तेल से नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती माँग की पूर्ति हेतु माइक्रोवेव विकिरण द्वारा बायोडीज़ल उत्पादन किया गया। 0.5% NaOH एवं 1.0% KOH उत्प्रेरक सांद्रताएँ उपयुक्त पाई गईं। माइक्रोवेव प्रेरित ट्रांसएस्टरीफिकेशन में प्रतिक्रिया समय (5 मिनट) पारंपरिक ऊष्मन (2–3 घंटे) की तुलना में बहुत कम रहा।
चंदन चूर्ण से नए सुगंध/आवश्यक तेल
थके हुए चंदन चूर्ण एवं सैपवुड चूर्ण के रासायनिक रूपांतरण से नए सुगंध/आवश्यक तेल (AESP 0.6% तथा SWA 0.9%) प्राप्त किए गए। इनमें तीव्र बादाम-सदृश सुगंध पाई गई तथा ये प्राकृतिक चंदन तेल से भिन्न गुणधर्म प्रदर्शित करते हैं। सुगंध एवं संबद्ध उद्योगों में इनके उपयोग की संभावना है।
द्विलिंगी वानिकी प्रजातियों में लिंग पहचान
वानिकी प्रजातियाँ एकलिंगी या द्विलिंगी हो सकती हैं। द्विलिंगी प्रजातियों में नर एवं मादा पौधे अलग-अलग होते हैं, जैसे Garcinia gummigata (G. cambogia), Garcinia indica, Myristica fragrans, Simarouba glauca आदि। खेती/वनीकरण में प्रत्येक 7–8 मादा पौधों पर एक नर पौधा आवश्यक होता है, इसलिए पौध अवस्था में लिंग पहचान महत्वपूर्ण है। संस्थान ने लिंग पहचान की सरल, किफायती एवं उपयोगकर्ता-अनुकूल विधि विकसित की है। साथ ही, जीवित छाल ऊतक में पेरॉक्सिडेज़ आइसोएंज़ाइम गतिविधि के आधार पर चंदन के उच्च-उपज वृक्ष की पहचान हेतु एक सरल क्षेत्रीय विधि विकसित की गई है; यद्यपि मानकीकरण से पूर्व और परीक्षण आवश्यक हैं।
भारतीय परिस्थितियों में आयातित लकड़ियों का प्राकृतिक प्रतिरोध
स्थलीय परिस्थितियों में भारतीय लकड़ियों की फफूंद एवं दीमक के विरुद्ध टिकाऊपन श्रेणियाँ प्रलेखित की गईं। देश में आयातित लगभग 90% लकड़ियों के प्राकृतिक प्रतिरोध का भी आकलन किया गया। अत्यधिक प्रतिरोधी लकड़ियों में Dryobalanops aromatica, Tectona grandis (पाँच देशों से), Shorea laevis, S. marcoptera, S. robusta, Pterocarpus soyauxii (दो देशों से) एवं Xylia dolabriformis शामिल हैं। Quercus robur मध्यम रूप से प्रतिरोधी पाई गई, जबकि Fagus sylvatica (दो देशों से), F. grandifolia, Fraxinus angustifolia, F. excelsior, Acer pseudoplatanus दीमक-संवेदनशील रहीं। यह जानकारी संस्थान द्वारा प्रकाशित आयातित लकड़ी उपयोगकर्ता पुस्तिका में सम्मिलित की गई है। BIS के अनुसार दीर्घकालिक अध्ययन प्रगति पर है।
लकड़ी अपशिष्ट से पॉलीहाइड्रॉक्सीएल्केनोएट्स (PHA) का सूक्ष्मजीवी जैवसंश्लेषण
परिणामों से लकड़ी अपशिष्ट को जैव-प्लास्टिक (PHA) उत्पादन हेतु सब्सट्रेट के रूप में उपयोग की संभावना सिद्ध हुई। Basidiomycota एवं Ascomycota वर्गों की सात श्वेत-सड़ांध फफूंद प्रजातियाँ लकड़ी (विशेषकर लिग्निन) अपघटन हेतु पहचानी गईं, जिनमें Trametes versicolor एवं T. pini का विकास उपयुक्त रहा। विभिन्न पर्यावरणीय स्रोतों से जीवाणु पृथकों में Nile blue A धब्बाकरण से PHA ग्रैन्यूल्स की उपस्थिति पाई गई। GC-MS से विश्लेषित हेमिसेलुलोसिक हाइड्रोलाइज़ेट में ज़ायलोज़ प्रमुख (>85%) पाया गया। Pseudomonas lignicola द्वारा PHA संचय को फ्लोरेसेंस माइक्रोस्कोपी से प्रदर्शित किया गया।
वन कीट प्रबंधन हेतु Metarhizium आधारित मायको-कीटनाशी (Peststat)
चयनित वानिकी प्रजातियों के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण कीटों के प्रबंधन हेतु Metarhizium आधारित तरल एवं पाउडर जैव-कीटनाशी विकसित की गई है। इनमें क्षेत्र से पृथक की गई दो रोगजनक स्ट्रेन्स का मिश्रण सम्मिलित है, जिससे समन्वित एवं बहु-कीट प्रभाव प्राप्त होता है। कम-लागत प्रोटीनयुक्त पदार्थों से विषाक्तता बढ़ाई गई है। छिड़काव/छाल अनुप्रयोग हेतु तेल-आधारित तथा मृदा अनुप्रयोग हेतु FYM, आरा-बुरादा, कोको-पीट या प्रेस-मड के साथ पाउडर फॉर्मुलेशन अनुशंसित है। कम लागत एवं सरल उत्पादन तकनीक के कारण यह बाजार में उपलब्ध कीटनाशियों के तुल्य या कम लागत की है।
कीटों की जैव-पारिस्थितिकी एवं प्रबंधन
सागौन के हार्टवुड बोरर पर विस्तृत अध्ययन कर समेकित कीट प्रबंधन पद्धतियाँ विकसित की गईं। Pongamia pinnata के फूल-गॉल उत्पन्न करने वाले गॉल मिज पर अनुसंधान के आधार पर रासायनिक एवं सांस्कृतिक प्रबंधन विकसित किया गया। कर्नाटक की नर्सरियों में प्रमुख वृक्ष प्रजातियों के कीटों का प्रलेखन एवं प्रबंधन पद्धतियाँ विकसित की जा रही हैं।
उत्पादकता बढ़ाने हेतु वानिकी में पर्यावरण-अनुकूल AM फफूंद
आर्बस्कुलर माइकोराइज़ल (AM) फफूंद फसल उपज एवं पोषक तत्व अवशोषण बढ़ाने, रोग-प्रतिरोध, सूखा-सहनशीलता एवं मृदा संरचना स्थिरीकरण में सहायक हैं। नर्सरी एवं वनीकरण कार्यक्रमों में इनका विशेष महत्व है। Santalum album, Tectona grandis, Grevillea robusta, Acacia auriculiformis, Eucalyptus camaldulensis, Casuarina equisetifolia, Wrightia tinctoria, Bombax ceiba, Cassia fistula, Dalbergia latifolia, Lagerstroemia fraseri तथा Rauvolfia serpentina, Aerva lanata, Helicteres isora, Garcinia indica, Bryophyllum calycinum जैसी औषधीय प्रजातियों पर परीक्षण किए गए। खदान-अस्वीकृत (क्षतिग्रस्त) क्षेत्रों में सफल रोपण से AM सहजीवन की उपयोगिता सिद्ध हुई, जो उष्णकटिबंधीय वानिकी में व्यापक संभावनाएँ रखता है।
2: जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिक सुरक्षा:
जैव विविधता संरक्षण
पश्चिमी घाट से संग्रहित Dendrocalamus stocksii की 102 जीनोटाइप्स वाली एक जर्मप्लाज्म बैंक बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विश्वविद्यालय, डापोली में स्थापित की गई है। D. stocksii की बहु-स्थानिक क्लोनल परीक्षणें कर्नाटक वन विभाग के सेंट्रल नर्सरी, होन्नावर और IWST के गोटीपुरा फील्ड स्टेशन में भी स्थापित की गईं।
पश्चिमी घाट की एक महत्वपूर्ण संकटग्रस्त औषधीय प्रजाति Embelia ribes के लिए टिशू कल्चर प्रोटोकॉल मानकीकृत किया गया, और 1500 माइक्रोप्रोपेगेटेड पौधे तैयार कर कठोर करने हेतु कटगल, अगुंबे की फील्ड नर्सरी में रखे गए।
पश्चिमी घाट के गीले सदाबहार वनों की दुर्लभ/संकटग्रस्त और खतरे में पड़े वृक्ष प्रजातियों जैसे Garciniagummigutta, Dysoxylummalabaricum, Canariumstrictum, Hydrnocarpuspentandra, Madhuca insignis और Mesua ferrea के बीज अंकुरण, शुष्क संवेदनशीलता और भंडारण स्थितियों का मानकीकरण किया गया। साथ ही, सुधारित और असंशोधित (SPA एवं CSO) सागौन की जनसंख्या की बीज गुणवत्ता और आनुवंशिक विविधता का मूल्यांकन किया गया।
कर्नाटक में चार स्थायी संरक्षण प्लॉट के संरचना, विविधता और पुनरुत्थान स्थिति के अध्ययन से पता चला कि वृक्ष घनत्व, बेसल क्षेत्र, परिधि वृद्धि और विविधता सूचकांक जैसे प्रजातियों की समृद्धि, शैनन सूचकांक, समानता सूचकांक और प्रजाति संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं।
पश्चिमी घाट की सफेद मक्खियों की पहचान
भारतीय सफेद मक्खियों (Aleyrodidae: Hemiptera) के टैक्सोनॉमी में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया। आठ नए जीनस स्थापित किए गए: Cockerelliella, Davidiella, Distinctaleyrodes, Fippataleyrodes, Icfrealeyrodes, Kanakarajiella, Pseudcockerelliella और Vanaleyrodes। अब तक भारत से 131 नई सफेद मक्खियों की प्रजातियाँ वर्णित की गई हैं। इसके अतिरिक्त, 12 प्रजातियाँ पहली बार भारत से रिपोर्ट की गई हैं। नर्सरी में सफेद मक्खियों और उनके प्रबंधन पर तकनीकी बुलेटिन प्रकाशित किया गया।
लकड़ी आयात के माध्यम से जैव-आक्रमण
देश में लकड़ी और लकड़ी उत्पादों के आयात से जैव-आक्रमण की संभावनाओं का अध्ययन किया गया। प्राप्त जानकारी में शामिल हैं: भारत में लकड़ी आयात के मौजूदा कानूनी ढांचे का विवरण, आयातक देशों द्वारा किए गए क्वारंटाइन उपायों की जांच, आयात के माध्यम से कीट परिचय और उनके फैलाव की संभावनाएँ, तथा भारत में पोस्ट-इंपोर्ट क्वारंटाइन सुविधाएँ स्थापित करने की व्यवहार्यता।
मकुट्टा, पश्चिमी घाट के वर्षावनों में लकड़ी पर निवास करने वाले फफूंदों की जैव विविधता
कुल 50 मैक्रोफंगाई प्रजातियाँ 29 परिवार और 38 जीनस में सूचीबद्ध की गईं और सभी नमूनों को प्रजाति स्तर तक पहचाना गया। पहचानी गई प्रमुख प्रजातियों में Artomyces pyxidatus, Bondarzewia berkeleyi, Calostoma cinnabarina, Calvatia cyathiformis, Cantharellus cibarius, Clavulina cristata, Clitocybe nuda, Coprinus comatus, Crucibulum leave, Daedaleopsis confragosa, Daedelea quercina, Entoloma bloxami, Fomes fomentarius, Galerina marginata, Polyporus varius, Pseudofistulina radicata, Stereum ostrea, Trametes elegans शामिल हैं। प्री-मॉनसून और पोस्ट-मॉनसून में Polyporus sp. अधिक प्रचलित था। Abortiporus biennis, Calostoma cinnabarina, Coprinus comatus, Pseudofistulina radicata और Stereum ostrea की पहली रिपोर्ट इसी क्षेत्र से आई। इस परियोजना के परिणामस्वरूप मैक्रोफंगाई की पहचान हेतु फील्ड गाइड प्रकाशित किया गया।
भारतीय चंदन (Santalum album Linn.) पर कीटों की विविधता और उनके इंटरैक्शन
संस्थान ने दक्षिण भारत के चंदन के प्राकृतिक और नर्सरी में लगाई गई प्रजातियों में कीट विविधता का दस्तावेजीकरण किया। चंदन पर प्रजनन करने वाले कीटों की पहचान और उनके प्रबंधन के लिए विशेषज्ञता विकसित की। चंदन कीट और रोग समस्या और उनके प्रबंधन पर एक मैनुअल प्रकाशित किया गया। सर्वेक्षण में पाया गया कि प्राकृतिक वन क्षेत्रों में हृदय लकड़ी बोरर Aristobia octofasciculata और लाल तना बोरर Zeuzera coffeae अधिक प्रचलित हैं। चंदन रोपणों में Z. coffeae कर्नाटक के सभी जिलों में प्रमुख बोरर है, जबकि Purpuricenus sanguinolentus केवल बेंगलुरु ग्रामीण जिले में प्रचलित है। P. sanguinolentus पांच इंस्टार, प्यूपा और वयस्क अवस्था से गुजरता है, यह एकवर्षीय है और केवल एक पीढ़ी पूरी करता है। गंभीर बोरर संक्रमण अक्सर बढ़ते पौधों की मृत्यु का कारण बनता है। छोटे परिधि वाले पौधे अधिक संवेदनशील होते हैं। चार हाइमेनोप्टेरा पैरोसिटॉइड प्रजातियों द्वारा परजीवी पाया गया। व्यक्तिगत बोरर के संक्रमण का स्तर कम होने पर भी संयुक्त संक्रमण से चंदन की मृत्यु हो जाती है। मिट्टी में बीज केक का उपयोग प्रभावी नहीं था। कीटनाशकों में Fipronil 0.3 G @ 40 gm/पौधा और Cartap हाइड्रोक्लोराइड @ 25 gm/पौधा बोरर के खिलाफ प्रभावी पाए गए।
3: वन और जलवायु परिवर्तन:
वनों में लकड़ी के अपघटन और मीथेन (CH4) उत्सर्जन का मूल्यांकन
संस्थान ने वनों में लकड़ी के अपघटन और उससे उत्पन्न मीथेन उत्सर्जन पर अध्ययन किया। परिणामों से पता चला कि मृत वृक्ष वनों में महत्वपूर्ण मात्रा में CH4 उत्सर्जित करते हैं और यह वैश्विक तापमान वृद्धि में योगदान कर सकते हैं। अध्ययन के अनुसार मृत वृक्षों से औसत CH4 उत्सर्जन: Rosewood-1949.89 ppm, Matthi-4630.36 ppm, Teakwood-1561.92 ppm, Seesam-3059.45 ppm, Dindiga-1470 ppm, Matthi (Dharwad)-2672.64 ppm, Unknown species (IWST)-10717 ppm। यह डेटा विश्व के उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्र से पहली बार उत्पन्न हुआ है और वायुमंडलीय मीथेन बजट विश्लेषण में सहायक हो सकता है। कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों (कुंदापुर वन प्रभाग) में औसत CH4 उत्सर्जन 11976.73 ppm था, जो अन्य स्थलों की तुलना में उच्चतम था। यह दर्शाता है कि इस जलवायु क्षेत्र में मीथनो-जैविक बैक्टीरिया के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं, संभवतः नमी मुख्य भूमिका निभाती है। मौसमी डेटा से पता चला कि गर्मियों में उत्सर्जन (11976.73 ppm) शीतकाल (152.84 ppm) की तुलना में अधिक था। CH4 केवल माइक्रोबियल प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न हुआ। IWST कैंपस में 24 घंटे के इंक्यूबेशन में उच्चतम CH4 उत्सर्जन 78690 ppm और 2 घंटे में न्यूनतम 20 ppm दर्ज किया गया। Methanogenium sp. मीथनो-जैविक प्रक्रिया में प्रमुख बैक्टीरिया पाया गया। ट्रंक लकड़ी से एनेरोबिक माइक्रोऑर्गेनिज़्म (Methanogenium sp.) का पृथक्करण और पहचान इस प्रक्रिया की पुष्टि करती है। अतः ये मृत वृक्ष (नई मीथेन स्रोत) कभी अनदेखे नहीं होने चाहिए।
4: वन आनुवंशिक संसाधन और वृक्ष सुधार:
सैंडलवुड की उच्च गुणवत्ता वाले स्टॉक के लिए प्रथाओं का पैकेज
IWST ने सैंडलवुड के बीज संग्रह, हैंडलिंग, भंडारण, अंकुरण और गुणवत्ता वाले पौधों के उत्पादन के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित किए हैं। ताजे संग्रहित सैंडलवुड फलों को पल्प से मुक्त कर छाँव में सुखाया जाता है। बीजों को अंकुरण बिस्तरों में बुवाई से पहले 16 घंटे 500 ppm गिबरेलिक एसिड में भिगोया जाता है। अंकुरण बिस्तर 1x10 मीटर का होता है, जिसमें सूखी नदी की बालू और नीचे बजरी की परत होती है। 2-3 पत्ती अवस्था के पौधों को 270cc रूट ट्रेनर्स में प्रतिरोपित किया जाता है, जिसमें सैंड: मिट्टी: कम्पोस्ट 35:15:50 अनुपात में होता है और प्राथमिक मेज़बान के रूप में Mimosa pudica या Cajanus cajan लगाया जाता है। मीडिया को 15-दिन की अवधि पर NPK + सूक्ष्म पोषक तत्वों के पत्ती छिड़काव से संवर्धित किया जाता है। रोग निवारक उपाय के रूप में Dithane M-45 (0.25%) और Ekalux (0.02%) का मासिक छिड़काव किया जाता है। 6 महीनों में 30-50 सेमी ऊँचाई और 3-4 मिमी कॉलर व्यास वाले स्वस्थ पौधे "गुणवत्तापूर्ण पौध स्टॉक" के रूप में तैयार होते हैं।
Dendrocalamus stocksii के लिए मैक्रोप्रोपेगेशन तकनीक
IWST ने Dendrocalamus stocksii के कलम कटिंग्स के माध्यम से प्रजनन की आसान विधि मानकीकृत की है। 1-2 वर्ष पुरानी स्वस्थ कलमों से फरवरी-मार्च में डबल और ट्रिपल नोड वाले कटिंग्स एकत्र किए जाते हैं। कटिंग्स को 0.25% बायटिंग में 10-15 मिनट डुबाया जाता है और 2500 ppm IBA के साथ पाउडर या घोल रूप में पल्स उपचार किया जाता है। इन्हें 1x5 मीटर के बालू बिस्तरों में क्षैतिज रूप से रखा जाता है और 2 सेमी बालू की परत से ढका जाता है। 10-15 दिनों में अंकुर उभरते हैं और 45-60 दिनों में जड़ें विकसित हो जाती हैं। फिर कटिंग्स को 1000cc या 1500cc पॉलीबैग्स में प्रतिरोपित किया जाता है जिसमें FYM: बालू: मिट्टी 40:50:10 अनुपात में होता है, नीम केक, SSP और Bavistin के साथ। पौधों को प्रारंभिक 2-3 सप्ताह एग्रो-शेड नेट में और फिर खुली नर्सरी में रखा जाता है। 6 महीनों में 2-3 तिलर और विकसित राइजोम्स वाले पौधे आउट-प्लांटिंग के लिए तैयार होते हैं।
वृक्ष सुधार और संरक्षण
सैंडलवुड क्लोनल बागानों में हृदय लकड़ी और तेल की मात्रा में विभिन्नता का अध्ययन किया गया। कुछ क्लोन्स में 20 वर्षों के बाद भी हृदय लकड़ी नहीं बनती। फोटोसिंथेटिक और जल उपयोग दक्षता का अध्ययन क्लोन्स के अनुसार भिन्न पाया गया। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और असम से सैंडलवुड के कोर सैम्पल लेकर हृदय लकड़ी, सैपवुड और तेल की मात्रा में विविधता का मूल्यांकन किया गया। विभिन्न रसायनों और विकास हार्मोनों के प्रभाव का अध्ययन कर teak में flowering को उत्तेजित करने के लिए paclobutrazol (49/tree) सबसे प्रभावी पाया गया। Jatropha curcas और Pongamia pinnata में बीज और तेल की मात्रा में विविधता का मूल्यांकन कर जर्मप्लाज्म बैंक स्थापित किया गया। Aegle marmelos और Feronia elephantum में आनुवंशिक और мор्फोलॉजिकल विविधता का दस्तावेजीकरण किया गया।
बेहतर लकड़ी के लिए वृक्ष सुधार
वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों के वृक्ष सुधार तब सार्थक होता है जब भविष्य की पीढ़ियों के लिए लकड़ी की गुणवत्ता के पैरामीटर प्रजनन जनसंख्या में शामिल हों। इसी के लिए लकड़ी की गुणवत्ता पर आनुवंशिक और पर्यावरणीय नियंत्रण का मूल्यांकन आवश्यक है। IWST ने लॉग्स और सॉउन टिम्बर में ध्वनिक वेग मापन प्रणाली विकसित की, जो लकड़ी की कठोरता की जानकारी प्रदान करती है। संस्थान गैर-विनाशकारी और त्वरित विधियाँ विकसित कर रहा है जो खड़े वृक्षों में लकड़ी की गुणवत्ता (कठोरता और घनत्व) का मूल्यांकन करती हैं।
उच्च वृद्धि तनाव कई तेज़ बढ़ने वाली प्रजातियों जैसे युक्लिप्ट्स के उपयोग में गंभीर समस्या है। IWST ने वायर स्ट्रेन गेज तकनीक आधारित गैर-विनाशकारी तरीकों से वृद्धि तनाव का मूल्यांकन किया। इसी से उचित प्रसंस्करण तकनीक अपनाने और लकड़ी के उचित उपयोग का निर्णय आसान होता है। नवजात पौधों में भी तेजी से वृद्धि तनाव मापा जा सकता है।
चयनित महत्वपूर्ण वृक्ष और बाँस प्रजातियों का मैक्रो और माइक्रो-प्रोपेगेशन
सैंडलवुड के उच्च तेल/हृदय लकड़ी वाले श्रेष्ठ क्लोन्स के लिए माइक्रोप्रोपेगेशन प्रोटोकॉल विकसित किए गए। Melia dubia और Embelia ribes के लिए भी माइक्रोप्रोपेगेशन विकसित किया गया। Tectona grandis और Eucalyptus tereticornis के लिए मैक्रो और माइक्रो प्रोपेगेशन प्रोटोकॉल स्थापित किए।
35 बाँस प्रजातियों का बाँस जर्मप्लाज्म बैंक स्थापित किया गया। Bambusa bambos, B. nutans, B. pallida, Dendrocalamus strictus, D. stocksii, D. brandisii, D. asper और Guadua angustifolia के माइक्रोप्रोपेगेशन प्रोटोकॉल विकसित किए गए। मैक्रो-प्रोपेगेशन से 30,000 पौधे तैयार कर 60 हेक्टेयर में प्रदर्शन परीक्षण स्थापित किए। आठ औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण बाँस प्रजातियों के बहु-स्थानिक प्रदर्शन परीक्षण स्थापित किए।
माइक्रोप्रोपेगेटेड पौधों की आनुवंशिक स्थिरता RAPD/ISSR मार्कर द्वारा सत्यापित की गई, जिसमें सैंडलवुड, Melia dubia, Bambusa bambos, B. nutans, B. pallida, D. strictus, D. stocksii और D. brandisii शामिल हैं।
कर्नाटक में सागौन की वन-रोपण में वृद्धि और उत्पादन अध्ययन
कुल और वाणिज्यिक (चर शीर्ष व्यास और बोले लंबाई) वॉल्यूम समीकरण विकसित किए गए। बड़े वृक्षों (dbh >15cm, कुल ऊँचाई >12m) में विकसित समीकरण अधिक सटीक हैं। हृदय लकड़ी, सैपवुड और छाल की मात्रा का भी मूल्यांकन किया गया। हृदय लकड़ी की मात्रा dbh के साथ बढ़ती है, छाल की मात्रा उम्र और dbh के साथ घटती है परंतु घनत्व के अनुसार बढ़ती है।
बाँस के फील्ड प्रदर्शन परीक्षण
Chickmagalur, Coorg और Hoskote में बाँस प्रजातियों (Bambusa balcooa, B. bambos, B. nutans, Dendrocalamus asper, D. brandisii, D. stocksii, D. strictus और Guadua angustifolia) की प्रदर्शन परीक्षण स्थापित की गई। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और गोवा में छह महत्वपूर्ण बाँस प्रजातियों की बहु-स्थानिक परिचय और प्रदर्शन परीक्षण की गई।
वनीकरण/एग्रोफॉरेस्ट्री
परंपरागत Ficus आधारित एग्रोफॉरेस्ट्री और पारिस्थितिक अध्ययन से पता चला कि Ficus के पत्तियों से निकलने वाले पोषक तत्व सूखी भूमि की फसलों की N, P और K की वार्षिक आवश्यकता का 70%, 20% और 67% तक पूरा कर सकते हैं। सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण से पता चला कि कुल भूमि क्षेत्र, सिंचित क्षेत्र का प्रतिशत, लाइन स्टॉक और परिवारिक श्रम आय प्रमुख कारक हैं। 12 वर्षीय कृषि सागौन के प्रबंधन स्थितियों (अनप्रबंधित, ब्लॉक रोपण) में भौतिक और यांत्रिक गुणों की दृष्टि से अनप्रबंधित लाइन रोपण बेहतर प्रदर्शन करता है।
कर्नाटक में किसानों के खेत में सैंडलवुड के एग्रोफॉरेस्ट्री परीक्षण स्थापित किए गए जिसमें आम, आंवला और कॉफी माध्यमिक मेज़बान के रूप में थे। सात वर्ष की आयु में कुछ वृक्षों में हृदय लकड़ी का निर्माण शुरू हुआ।
पीएच.डी. कार्यक्रम और परियोजना कार्य
Institute of Wood Science & Technology उन छात्रों को Ph.D. डिग्री के लिए प्रवेश देता है, जो Forest Research Institute University, Dehra Dun में पंजीकृत होंगे। 2000 से अब तक, IWST में पंजीकृत कुल 83 उम्मीदवारों को FRI Deemed University के अंतर्गत Ph.D. डिग्री प्रदान की गई है, जो Ph.D. ऑर्डिनेंस के क्लॉज 3.3 के अंतर्गत अनुसंधान विषयों में हैं। 2011-2016 के दौरान 32 उम्मीदवारों को Ph.D. डिग्री प्रदान की गई।
संस्थान विभिन्न विश्वविद्यालयों/संस्थानों/कॉलेजों के स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को उनके प्रबंध कार्य/डिसर्टेशन कार्य में समर्थन भी प्रदान करता है। संस्थान के वैज्ञानिकों को विभिन्न विश्वविद्यालयों/संस्थानों द्वारा अतिथि व्याख्यान देने और बाहरी परीक्षक के रूप में आमंत्रित किया जाता है।
निगरानी और मूल्यांकन:
संस्थान कर्नाटक में लोहे की खानों के पुनर्वास और पुनर्स्थापना कार्यक्रम विकसित करने में शामिल रहा है। संस्थान कर्नाटक वन विभाग को विभिन्न वृक्ष प्रजातियों के परीक्षणों के मूल्यांकन और आकलन के लिए सेवाएं प्रदान करता है। संस्थान भारत के वन प्रकारों के पुनर्मूल्यांकन कार्यक्रम का भी हिस्सा रहा है।
संस्थान की एक्सटेंशन इकाई विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से हितधारकों तक पहुँचती है जैसे कि प्रदर्शन कार्यक्रम, वन विज्ञान केंद्र (Van Vigyan Kendras), किसान मेलों, सम्मेलन, सेमिनार, कार्यशालाएं, प्रशिक्षण और प्रकाशनों के माध्यम से।
अधिक जानकारी के लिए देखें: http://iwst.icfre.gov.in/
अंतिम बार समीक्षा और अद्यतन की तिथि: 12 Mar 2019
